छोड़ो … जाने दो !

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छोड़ो … जाने दो !

बहुत गहरी लगी थी वो बात देर तक रह गयी थी याद
लफ्ज़ बेस्वाद कर गए थे ज़ेहन का स्वाद 
फिर एक रोज़ जब अपना पसंदीदा गीत गुनगुनाया, 
लबों पर मुस्कुराहट और जिंदगी में स्वाद लौट आया,
बहुत चोट पहुंची थी उस हरक़त से, दिल कुछ नही भूला,
मायूसी हिस्सा बन गयी थी सांसों का । 
फिर एक रोज़ जब फुर्सत से दिल दिमाग को साफ किया 
तो सुकूँ का एक बादल उठा और मायूसी पर छा गया
अकेला कर गया वो बेहद, कोई रास्ता समझ नही आया,
तन्हाई परछाईं सी चारों ओर घिर आयी 
फिर एक रोज़ हिम्मत की तन्हाई से थोड़े फांसले किये
और जाने कैसे हाथ बढ़ते गए, दोस्त मिलते गए।

an educator presently serving as Academic Director , keeps deep passion for writing blogs , poetry and uploads videos of selfwritten short stories on YouTube .

3 COMMENTS

  1. इस तन्हाई का हम पे बड़ा एहसान है साहब !
    न देती ये साथ अपना तो जाने हम किधर जाते !!

  2. When someone writes an article he/she maintains the image of a user in his/her mind that
    how a user can understand it. Thus that’s why this piece of
    writing is great. Thanks!

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