मेरी तुम

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मेरी तुम

क्यों कभी-कभी हो जाती हो खुद में ही गुम ?

कहीं अपने आप से ही बेखबर हो जाती हो,

खुश रहा करो I ना यूँ हुआ करो उदास….मेरी तुम

क्यों लोगो की बात को इतना मन पर लगाती हो ?

बेमतलब अपने लिए परेशानी बढ़ाती हो,

छोड़ो फ़िजूल की बाते I ना करो कोई गम ….मेरी तुम I

ठीक है मुश्किलें बड़ी है , हवाएं विपरीत बह रहीं हैं I

वक्त देगा जरुर साथ, थामो सब्र का हाथ,

क्यों हो डर जब एक दूजे के साथ हैं …तुम हम I

खुश, आबाद और बिंदास रहो !!

मुस्कराहट तुम्हारे लबों पर कभी हो ना कम ….मेरी तुम I

 

an educator presently serving as Academic Director , keeps deep passion for writing blogs , poetry and uploads videos of selfwritten short stories on YouTube .

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