तमन्नाओं की महफिल

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तमन्नाओं की महफिल सजी थी
हर तमन्ना बन ठन कर खडी थी
आज तो हम जी ही लेंगी
इसी आस से बेचारी सब  बैठी थीं
उन्हें क्या पता था कि
किसी भी पल
इक आंधी आकर
महफिल की शमा बुझा देगी
और
उनकी आस उजाड देगी
फिर भी
तमन्नाओं की महफिल सजी थी
और
हर तमन्ना बन ठनकर खडी थी ।

– डॉ. संगीता ठक्कर

मेरा व्यक्तित्त्व किसी परिचय का मोहताज नहीं
यह तो मात्र एक बीज है, वटवृक्ष नहीं
लेखन जूनून है मेरा, यह कोई व्यवसाय नहीं |

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